रोज़ हिदायतें मिलती हैं, "शाम को 8 बजे के बाद बाहर मत घूमा करो!"
"7 बजे के बाद ऑटो मत लिया करो!"
"सर्दी हो रही है शामों को अकेले तो बिलकुल मत निकला करो!"
हर रोज़ फ़ोन के उस पार से आती उन हिदायतों को मैं सुनती, और लगभग रोज़ ही इन हिदायतों का कुछ नही होता। पापा से सुनने को भी मिल जाता कि अब सुनने की आदत रही नहीं तुझमें।
दिल्ली जैसे शहर में जहाँ की सड़कें रास्तों से ज़्यादा लंबी पड़ती हैं, 7 या 8 बजे की समयसीमा निभाना मुश्किल है। सो इसी वजह से आखिरी लिमिट के कुछ आधा घंटे ऊपर, 8:30 बजे, एक शनिवार की शाम मैं ऑटो लेकर दिल्ली आई.आई.टी की तरफ चली। वहीं थोड़ा आगे हौज़-ख़ास विलेज का मोड़ है। टर्न लेते वक़्त ऑटो गटर लेन में फँस गया। इसमें कुछ नया नहीं है। अक्सर थ्री-व्हीलर इस मोड़ पर सड़क की इस ढलान में फंस जाते हैं।
ऑटो वाला उतर कर ऑटो पीछे धकेलने लगा। ट्रैफिक, जो शनिवार शाम की वजह से थोडा ज़्यादा ही था, हमारे ऑटो की वजह से पलभर को थम गया। इसी में एक गाड़ी वाला ऑटो के बिल्कुल पास गाड़ी लगाते हुए बोला, "मैडम इसके बस की नहीं। कहो तो हम छोड़ दें?"
अबतक ऑटो गटर लेन से निकल गयी थी। ऑटो वाला औसत से थोड़ी ज़्यादा तेज़ ऑटो चलाकर आगे निकल गया।
10 मिनट बाद गंतव्य पर पहुंचे। ऑटो से उतरकर मैं पैसे देकर मुड़ी ही थी कि ऑटो वाला बोला, "मैडम आप ज़्यादा मत सोचना, ये सब तो हो ही जाता है।"
मैं बिना कुछ बोले आगे बढ़ गयी। वाकई कहाँ नया था कुछ इसमें। ये तो होता ही आया है। पिछले 10 मिनट से मैं खुद में बंधी बैठी थी... रह-रह कर उन पीले दांतो वाली हंसी से कोफ़्त हो रही थी... उस गाड़ी से उठती तेज़ शराब की बू मेरी साँसों को जैसे अब भी गन्दा कर रही थी... पर क्या फर्क पड़ता था?
ये सब तो होता ही आया है।
जानते हैं उस पल पापा की हिदायतें न मानने के लिए खुद को झिड़क दिया था। क्या ज़रूरत थी मुझे इस वक़्त निकलने की? हाथ की कंपन संभालते हुए घडी देखी तो 9 भी नहीं बजा था।
फ़िर ज़हन में एक ख्याल और आया। क्या वाकई इस शहर में एक लड़की का भरे बाज़ार की मेन रोड से रात 8:40 पर निकलना इतना बड़ा जुर्म है? क्या गाडी का शीशा नीचे कर शाम के ऐसे वक़्त शराब के नशे में धुत्त
लड़के, माफ़ कीजियेगा, आदमियों को कुछ भी कहने का हक़ है?
क्या उनका अपने घर से निकालकर ये सब करना इसलिए सही है क्योंकि वो लड़के हैं, और, मेरा सूरज के साथ ही अपनी आज़ादी को भी दिन के लिए अलविदा कह देना क्योंकि मैं लड़की हूँ?
खुद से ही चिढ हो आई। मेरी गलती नहीं थी कि कुछ जानवरों को भगवान ने गलती से इंसान बनाया। मेरी गलती नहीं थी कि दिल्ली जाम होती है। मेरी गलती नहीं थी कि उस शहर से तहज़ीब एक खोती जागीर है।
तो क्या मैं यूं ही पीछे मुड़-मुड़ कर ये देखती रहूँ कि कहीं मेरा पीछा तो नहीं हो रहा? क्या करूँ? कितनी एप्प डाउनलोड करूँ, कितने स्पीड डायल लगाऊँ?
अपने साथ कितने केअर टेकर लेकर चलूँ साथ कि खुद को सेफ महसूस कर सकूं?
हर रोज़ अख़बार पटे पड़े होते हैं रेप, छेड़छाड़ की ख़बरों से। "शोहदे" नाम का एक फैंसी टर्म भी खोज लिया है पत्रकार परिवार ने। पकडे जाने पर क्या सज़ा है इन लोगों को?
सच तो ये है कि एक लड़की के ऊपर एसिड फ़ेंक देने जैसी हैवानियत की सज़ा ज़मीन गबन करने की सज़ा से भी कम है। और भगवान, अल्लाह, ईसा सब मिलके न करें, गर ये हैवानियत किसी 17 साल 364 दिन के अवयस्क ने कर दीं, तो सुधार की गुंजाईश में उसे 2 साल के भीतर ही बाल सुधार गृह से मुक्ति मिल जायेगी।
ये सब जब वो पकड़ा जाये।
इस समाज में औरत होना सबसे बड़ा जुर्म है। घर वाले सौ पाबंदियों में लड़की को रख सकते हैं, पर आधी रात को घर लौटते लड़के को सीख नहीं दे सकते की लड़की से बात करने की तमीज क्या है।
लड़की को संस्कारों की मूर्ति बना देंगे, ताकि एक रोज़ हाथ में चाय की ट्रे पकड़ा कर उसकी देखवकी परेड करा सकें, पर लड़के को एक बार उस चाय में पड़ने वाले दूध-पानी का नाप नहीं सिखाएंगे।
जब तक ये नहीं बदलता न मेरे दोस्त, यूं ही भरे बाज़ार, हर शाम मेरे जैसे लड़कियाँ डरती रहेंगी। कंधे में निगाहें छुपाकर पीछे पलट-पलट कर देखती रहेंगी।
पर मुझे शिकायत का क्या हक़? इन्साफ की बदलाव की उम्मीद का क्या हक़? अपने ही शहर में, वो शहर जो देश की राजधानी है, वहां लड़की होकर महफूज़ ज़िन्दगी मांगने का क्या हक़?
क्योंकि इसमें नया क्या है? क्योंकि यूं तो होता ही आया है।