Tuesday, 8 December 2015

वो जगह जिसे घर कहते हैं

बहुत देर लगी ये सोचने में पहला ब्लॉग कहाँ से शुरू किया जाये| खाली स्क्रीन को ताकते-ताकते कुछ 15 मिनट हो गये थे और ख्याल एक भी नहीं था| ज़हन में एक नाम भर था.. इब्तिदा.. इब्तिदा यानि शुरुआत.. प्रारंभ.. पहला कदम...
पहला कदम जो हम माँ का हाथ पकड़ कर लेते हैं पहला कदम जो हम स्कूल में रखते हैं | फिर अचानक ज़िन्दगी हावी हो जाती है और आता है वो कदम जो हम ज़िन्दगी की तरफ लेते हैं.. वो कदम जो अमूमन हमें घर से दूर ले जाता है..
ज़िन्दगी नए पेंच बैठा देती है| कारोबारी रिश्ते सजा देती है| हम कदम दर कदम बढ़ते जाते हैं| नयी दुनिया गढ़ लेते हैं| नयी जगह की नई मिट्टी में घर की सौंधी खुशबू ढूंढते हैं| उस खुशबू के न मिलने पर उदास भी होते हैं.. पर कोई रंगीन सी तितली दिखते ही सारा दर्द भुला कर उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ जाते हैं| कितनी ही बार मनचाहे रंग हाथ आते हैं, कितनी ही बार मुट्ठी खाली भी रह जाती है|

रंगों के मिलने की ख़ुशी और खाली हाथ का दर्द बांटने के लिए बड़ा याद आता है ये घर| कभी कभी रुख भी कर लेते हैं हम इस घर का.. जहाँ २ दिन तो मन भर के साथ, प्यार, एहसास, ताकत सब एक साथ पोटली बनाकर इक्कट्ठा कर लेते हैं.. पर तीसरे दिन से वही रंगीली तितली याद आने लगती हैं| इन रंगों का भी नशा है| सादी, सौंधी मिट्टी इसे भर नहीं पाती|

हम रंग सजाते आगे बढ़ जाते हैं, घर के आँगन का प्लास्टर धूप और बारिश की मार से बदरंग होता चला जाता है| हम हरियाली सजाते हैं, आँगन काई से जूझता है| जाने कितनी अमरइयां हर मौसम इंतज़ार में ही मुरझा जाती हैं.. हम लौट नहीं पाते| फिर लगता है, ये नया बसेरा ही सही है| यहाँ रंग है, रौशनी है, सपने हैं, जीवन है|

एक अकेला, अँधेरा आँगन  हमारे इंतज़ार में शामें गिनता बैठा रह जाता है| हमें लगता है हमने रंग भर लिये अपने लिए, पर भूल जाते हैं, इस आँगन का रंग-रोगन भी तो हमारे ही जिम्मे था|

तो कभी उठाइए अपने रंगों के थैले को, कुछ पेंट ब्रश भी ले लीजियेगा.. और करिए रुख उस आँगन का जहाँ आपका पहला कदम है| पहली हंसी है, माँ की पहली फटकार है, पापा का पहला दुलार है, स्कूल से मिला वो पहला पुरस्कार है| साल में हर दिवार एक बार रंगाई मांगती  है| रिश्ते इससे कहीं ज्यादा मरम्मत चाहते हैं| वहां की मिट्टी सी खुशबू दुनिया के किसी बसेरे में नहीं|

तितली कितनी भी खूबसूरत हो, रहती फूलों पर ही है| वो फूल जिन्हें खिलने के लिए मिट्टी चाहिए.. वही बदरंग, सौंधी मिट्टी|

23 comments:

  1. बड़ी खूबसूरती से लिखा है घर से उठाए पहले कदम के बारे में पर कई बार लौटना आसान नहीं होता, या वो लौटना लौटने जैसा नहीं होता।

    पहले ब्लॉग के लिए शुभकामनाएं।
    खूब लिखो!

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    1. जब घर का लौटना लौटने जैसा नहीं होता तब जडें कहीं न कहीं ठौर ढूंढ ही लेती हैं। जहाँ जडें हैं, वहां घर है। :)

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    2. जब घर का लौटना लौटने जैसा नहीं होता तब जडें कहीं न कहीं ठौर ढूंढ ही लेती हैं। जहाँ जडें हैं, वहां घर है। :)

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  2. तुम्हारी कलम में धमक है। एक भाई को गर्व हो ऐसा लिखा है। घर...यह लफ्ज बड़ा फेशिनेट करता है। मेरी यादों में मधुपुर है सपनों में है। हर किसी का अपना मधुपुर होता है। अतीत चाहे कितना भी कड़वा क्यों न हो उसकी यादें मीठी होती हैं।

    पहले पोस्ट की बधाई। अगले का इंतजार है।

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    1. शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया भाईजान!
      अगला जल्दी लिखेंगे :)

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  3. और हां, फैशिनेट को फैसिनेट पढ़ना

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  4. जुड़ने वाला हर सफहा तुम्हारा नाम बड़े फ़ख्र से सम्हालेगा और आगे ले जाएगा......
    ढेर सी शुभकामनाएं इस चंचल तितली को.....
    लिखती रहो.......

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    1. अनुलता जी बहुत बहुत धन्यवाद :)

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  5. ब्लॉग की दुनिया में स्वागत। घर, मिट्टी और गाँव ये शब्द हमें बीच-बीच में याद दिलाते है कि भूलना मत बिना जड़ों के पेड़, पेड़ नहीं ठूंठ होते है।
    और इंतज़ार रहेगा ऐसी सौंधी महक लिए तितलियों का।

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    1. शुक्रिया सुमेर। अगला जल्द ही लिखेंगे। :)

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  6. बहुत सुन्दर रचना......
    जीवन में बेतरतीब से बिखरे हुए यादो के लम्हों को बहुत उम्दा तरीके से आपने अपने लेख में पिरोया है और उस से, उस एक पुराने दौर की वो बाते ताज़ा कर दी जिस दौर में आज कोई लौट के नही जाना चाहता। कितनी आसानी से आपने उस पुराने दौर में सभी को पहुंचा दिया, इस चकाचौंध से निकालकर। ......

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    1. घर की याद सबके ज़हन में होती है, कोई मान लेता है कोई नहीं। घर कभी पुराना नहीं होता :)

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  7. "एक अकेला, अँधेरा आँगन हमारे इंतज़ार में शामें गिनता बैठा रह जाता है"--भावपूर्ण और बेहतरीन लेखन...लेखनी में जमीन का एहसास है...ब्लॉग लेखन के लिए शुभकामनाएँ

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    1. शुक्रिया पियूष :)

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  8. "तितली कितनी भी खूबसूरत हो, रहती फूलों पर ही है| वो फूल जिन्हें खिलने के लिए मिट्टी चाहिए.. वही बदरंग, सौंधी मिट्टी|"...... जड़ों से जुडने का और आसमान में उड़ने का ये सिलसिला ज़िंदगी भर चलता रहेगा

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    1. शुक्रिया जय श्रीकर जी!

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    2. शुक्रिया जय श्रीकर जी!

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    3. bahut amda likha hai,
      aapki likhi kahani bhi bahut acchi hoti hai,
      aawaz ke jadugar neelesh misra ji ke sath rahkar aap sab bhi shabdon ke jadugar ho gaye ho
      aapka tahedil se shwagat is duniya mai

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  9. Bade late aae aap is duniya me....welcome ji welcome!!😊
    PAdhie mera likha b-
    Http://meraapnasapna.blogspot.com

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  10. Bade late aae aap is duniya me....welcome ji welcome!!😊
    PAdhie mera likha b-
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