Monday, 4 January 2016

काश हम भी कबूतर होते

परसों दिल्ली एअरपोर्ट पर चेक-इन कर के बोर्डिंग के इंतज़ार में बैठी थी। जहाँ बैठी थी, वहां कई परफ्यूम के कीओस्क थे। कीओस्क माने वो छोटे-छोटे एक शेल्फ वाले स्टाल जिनको महंगे ब्रांड होने के वजह से लोग स्टाल कहते नहीं हैं। स्टाल चाय के होते हैं, पान के होते हैं... वर्साचे, अरमानी, पार्कोस के कीओस्क होते हैं।

तो कहाँ थे? हाँ, परफ्यूम। भीनी-भीनी खुशबू थी हवा में। इसी खुशबू में आते-जाते लोगों को एअरपोर्ट नाम के उस सुपर ब्रांड्स के सुपर मॉल में देख रही थी। कोई और दिन होता, तो बाजार घूमने की भीड़ में मैं भी शुमार होती। इन्हीं परफ्यूम के कीओस्क की भूल-भुलैय्या के बीच से जाने कैसे एक कबूतर की गुटर-गूं सुनाई पड़ी।

आँखों में मोटे-मोटे आँसू धरे थे... कबूतर कुछ धुंधला सा ही दिख रहा था। दरअसल, सिक्यूरिटी-चेक में एक पसंदीदा कांच की बोतल बैग से निकलवा कर फ़ेंक दी गयी थी। बताया गया, रेड अलर्ट है, हम कुछ नहीं कर सकते।

बांवरा मन, किसी से भी जुड़ जाता है। चीज़ों से भी। उसी बोतल में सोचा था एक मनी प्लांट लगाएंगे। पर बोतल निर्ममता से कचरे के डब्बे में चली गयी। उसी के साथ पेड़ लगाने का ख्वाब भी चला गया।

पठानकोट पर हुए हमले की करारी मार टूटे ख्वाब से महसूस हुई थी। वहां ड्यूटी ऑफिसर से थोड़ी बदतमीज़ी भी कर गयी मैं। अखिलेश चौधरी नाम था उनका। माफ़ी मांगी बाद में, पर मन में अफ़सोस अब भी है। वे सिर्फ अपनी ड्यूटी पे थे, सशक्त थे, मेरे मन की न रख पाने को मजबूर थे।

इसी मसोस-अफ़सोस में दिखा ये कबूतर। न इसके पास बोर्डिंग पास था, न इसने जूते-जैकेट उतार के सिक्यूरिटी मशीन को दिखाया था, न इसने अपनी 500 ml की पानी की बोतल को जबरन पी कर 100 ml किया था।

अपने ही मुल्क में सफ़र करने का जुर्म नहीं कर रहा था ये। अपने ही मुल्क में इंसान होने का गुनहगार नहीं था ये।

इसने बस पर फैलाये थे और आ बैठा था इन महंगे परफ्यूम की शीशियों पर... जिनको आम आदमी की पहुँच के बहुत बाहर रखा जाता है।

नए साल में फैली पठानकोट की दहशत इसके दिल में नहीं थी... कुछ माटी के लालों के उजड़े चमनों के दर्द से इसका कोई वास्ता नहीं था। एक पेड़ लगाने की अधूरी ख्वाइश इसको कभी नहीं सालेगी।

कई बार सुना है, दुःख चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका एहसास तभी होता है, जब वो खुद पे गुज़रे। एक कांच की बोतल के फिंकने से कांच की चुभन सा गड़ा था ये हमला।

वहां पठानकोट में अभियान अब भी जारी है... पर गूँज उस 24 किलोमीटर के रेडियस वाले एयर बेस तक नहीं सीमित है। गूँज सारे देश में है। कहीं एअरपोर्ट की बढ़ी सुरक्षा जांच में, कहीं बम की अफवाह से खाली होती ट्रेनों में, कहीं पाकिस्तान से सीधा लोहा लेने की सियासी मांगों में।

आंच किसी के भी घर में लगे, राजनैतिक रोटियां उसपे सिक ही जाती हैं। इस सियासत, बगावत, मुहीम से भी इस कबूतर का कोई लेना-देना नहीं।

वो किसी मुल्क का नहीं। वो हर मुल्क का है। कहीं लाहौर से आया कबूतर भी तो हो सकता है वो। पर वो घुसपैठिया नहीं। वो उन्हीं पैरों से मंदिर का आँगन छू सकता है और मस्जिद का गुम्बद भी। कबूतर जहाँ का भी हो, जैसा भी हो, शांति का ही प्रतीक है।

आंसू भरी आँखों का आराम है। दर्द में उभरी हल्की सी मुस्कान की वजह है। अपने ही वतन में कोई शक के दायरे से बाहर नहीं। घर तो है, पर हम घरवाले नहीं। उस कबूतर को इस बे-दरी का कोई दंश कहाँ।

वो तो मन-मौजी जहाँ चाहे उड़ जाये। काश होते न हम भी कबूतर... उड़ जाते किसी ऐसी जगह जहाँ सरहदों की मिलकियत न हो, जहाँ सैयादों का डर न हो।

चुप परवाज़ भरते... और जा बैठते दुश्मन के ही किसी ठिकाने पर... किसी टूटे दिल पर मरहम-सा बनकर...
क्योंकि इंसान कहीं भी हो, कैसा भी हो, दोस्त हो या दुश्मन हो, दिल के सुराखों को बारूद से नहीं भर सकता।

सच, काश हम कबूतर होते...

3 comments:

  1. कितना अच्छा लिखती हो लड़की ...तेरी कलम की रोशनाई मन निचोड़ कर निकाली जाती है क्या ?

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    1. कोई रोशनाई नहीं है दीदी, आप सब का साथ है :)

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    2. कोई रोशनाई नहीं है दीदी, आप सब का साथ है :)

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