Friday, 25 March 2016

मिसिंग यू सुधा आंटी

बहुत मुश्किल है जो लिखने जा रही हूँ। सीने पे रखा कोई पत्थर है शायद जो सांस बेइंतेहा भारी किये दे रहा है। रह-रह कर हर वो छोटी से छोटी याद आँखों के सामने आ रही है, जो याद भी नहीं था कि याद है।

सुधा आंटी। जानती हैं, मैं आपको कुछ भी कह लूँ, रहेंगी आप मेरी माँ ही। माँ से भी बड़ी। बड़ी माँ। क्योंकि मेरी माँ को भी आप ही तो संभालती हैं। या संभालती थीं। तीन दिन पहले तक।

होली के अनगिन रंगों को वक़्त ने एकसाथ बदरंग कर दिया इस साल। आपको हमसे छीन कर। आपको और हमें अलग कर के।

आप जानती हैं, कलाई पे पहनने वाले ब्रेसलेट से लेकर भजन की डायरी में लिखे सारे भजनों में हैं आप। फ़ोन के फ़ोटो एल्बम में से लेकर ज़िन्दगी की हर बदलती तारिख-ओ-तस्वीर में आपका अक्स है।

आपके साथ जो पहले-पहल की याद है वो क्लास टेंथ की है।  मंदिर के दस-लक्षण के शाम वाले भजन कम्पटीशन को जीतने वाली याद। हमने साथ भजन गाया था, इतनी शक्ति हमें देना दाता।

पर्पल चमकते रैपिंग पेपर में 4 ग्लास का सेट मिला था, फर्स्ट प्राइज।  आपको और मुझे। हमारे रिश्ते की ठेस बुनियाद उन खोखले स्टील के गिलासों से पड़ी थी!

मेरे टेंथ के पेपर शुरू होने के एन पहली रात आप ट्रे सजा के कार्ड और गुलदस्ते लाईं थीं। पेन भी। ऑल द बेस्ट कहने को। उसी पेन से एग्जाम लिखे भी थे मैंने।

मंदिर के प्ले लिखवाये हैं आपने मुझसे। मुझे प्ले में ही सही, तीर्थंकर भगवान बनाया है आपने।

ऐसी और न जाने कितनी यादें हैं जिन्होंने नींद की चिड़िया को किसी दूर गाँव भेज दिया है। मन हल्का होने का नाम ही नहीं लेता।

आपके जाने पे एहसास हो रहा है कि दुःख कोई पहाड़ नहीं है, जैसा ये सब दुनिया वाले कहते हैं। ये दुःख तो रेशम को काटने वाले कीड़े की तरह हैं। धीरे-धीरे रेशम को खा जाने वाले कीड़े के जैसा। कपड़ा पूरा कटता भी नहीं और काम का भी नहीं रह जाता। बिलकुल हमारे मन की तरह।

आँखों के आँसूओं की कोई बात नहीं करना चाहती मैं। वो तो यूं भी बहने का काम किस्मत में लिखवा के आये हैं। उनका जॉब प्रोफाइल है, बहना। दर्द है, तो ये भी हैं।

आंटी आप जानती हैं न, आप बहुत से वादे अधूरे छोड़ के गयी हैं? आप ये भी जानती हैं न कि आपके पीछे जितने भी रह गए हैं अब वो पूरी तरह से पूरे कभी नहीं हो पाएंगे?

पर आपसे कोई शिकायत नहीं है। जानबूझ के तो आप कभी ऐसा नहीं करेंगी न! पर आंटी, आप ये क्यों नहीं बता देती कि हम अब रहें कैसे?

बैठक के वक्त कितने लोगों ने आपके बारे में कितना कुछ कहा। मेरे पास आपको शब्दों में ढालने के लिए अल्फ़ाज़ नहीं हैं। मुझे ये पता है कि मेरे सर पर जिस आसमान का साया है, उसमें एक सुराख़ हुआ है। बहुत बड़ा सुराख़। न भरने वाला सुराख़।

ज़िन्दगी है तो जीना पड़ेगा और दुःख है तो सहना पड़ेगा।
ऐसा भी नहीं है कि हम पिछले 3 दिन में मुस्कुराये न हों। आज शाम तो हंसे भी थे। पर मन नहीं लग रहा। ज़रा सा भी।

आप होतीं तो कॉफ़ी पिलाके इधर-उधर की बातें होतीं, और, कहीं न कहीं पढाई छोड़ने की बात एक बार तो आती ही।

मिसिंग यू आंटी। बहुत ज़्यादा। फ़िकरा सा बंध गया है है आपकी यादों का,खुशबू की तरह महकता है, न सोने दे रहा है न जागने।

पर मुझे न विश्वास है, आप जहाँ भी हैं, बहुत खुश हैं। और आपकी वो मरहम की राहत सी मुस्कान किसी दिल को तो सुकून दे ही रही होगी।

वहां भी कोई वृषाली होगी, जिसे आपकी ज़रूरत होगी। यकीन मानिये, आपके जैसे इंसान की ज़रूरत सबको होती है। सबको।

बस आप खुश रहिएगा। और जल्दी लौट आइयेगा। किसी भी तरह, किसी भी शक्ल में, किसी भी रूप में ।
आप भी हम सबके बिना बहुत तो नहीं रह पाएंगी।

लव यू आंटी। लव यू वैरी मच। एंड आई नो, यू लव अस एक़ुअल्ली। मे बी, मोर।

कम बैक सून, प्लीज़...

7 comments:

  1. अपनों को खोना क्या होता है, यह जानता हूँ. लेकिन जाने वाले की सारी यादों को संजोये जिन्दगी आगे बढ़ जाने को बाध्य है. आपकी यादें, आपके होने तक आपके साथ है. आपके चले जाने के बाद आप भी दूसरों की यादों में रहेंगे. "द शो मस्ट गो आॅन!"

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    1. शान जी मेरे लिए बहुत मुश्किल है। वो मेरी माँ ही हैं। मुझे नहीं मालूम इसे कैसे सँभालते हैं...

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  2. समझ सकता हूँ. वक्त को मौका दीजिए, सब ठीक हो जाएगा. मैनें भी आज से 8 साल पहले अपनी माँ को खोया है.

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    1. उस वक़्त नहीं लिखा, पर हिम्मत देने का शुक्रिया शान जी। शब्द मरहम हैं, देर सबेर असर कर ही जाते हैं।

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  3. 😊wo aapke aas-pas hi h...khush rahie di!!

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    1. शुक्रिया सारिका।

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    2. शुक्रिया सारिका।

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