कल शाम जल्दी सोने चली गयी थी| जागने का फायदा
क्या था? जी उठा जा रहा हो तो काम तो होते नहीं कुछ! फिर क्या पढ़ाई और क्या कड़ाही?
न खाना बनाया, न किताब खोली|
बस अनमन पड़ी रही|
आदत है, सोने के पहले कुछ सुनने की| प्लेलिस्ट
लगा कर छोड़ी, तो बैरन वहां भी चली आई ये याद... आँख लगने को ही थी कि वजाहत हुसैन
खां बदायुनी की आवाज़ में ‘काहे को ब्याही बिदेस’ बज उठा|
फिर नींद नहीं आई| तारिख़ किसी कर्ज़ख्वाह की तरह
ज़ेहन के दरवाज़े पीटती रही, जब तक उठकर बैठ न गयी मैं|
मन जब उचटा हो तो सबसे रूखा उन्हीं से हुआ जाता
है जिनके लिए सबसे अधिक टीसता है| इसलिए घर भी बात नहीं की|
राखी है|
परदेस है|
याद है|
नज़र में घर है|
घर में भाई है|
घर में भाभी है|
घर दूर है|
नज़र में घर है|
नज़र में घर तिरा-तिरा सा है|
बस इसीलिए मन उचटा है|
थाली सजी तो होगी, रेशम की राखी रखी तो होगी|
थाली के बायें कोने में समृद्धि का रोली-चावल होगा, जो बहन भाई के माथे चढ़ाती है— एक
बगल शुभ का नारियल होगा, जो बहन भाई के हाथ में धरती है— एक बगल मीठा रखा होगा, जो
बहन भाई के जीवन में घोल देना चाहती है— और किनारे, आधी थाली से लटकती, आधी टिकी-सी
धरी होगी मेरी राखी— मेरे भाई की कलाई बंधने वाले मेरे वादे, बंधन, प्रेम, टीस,
अपनाइश और एके के डोरे!
घर भरा होगा| मौसियों, भाभियों, बहनों से|
वहां वो सब याद करते होंगे, यहाँ मैं— परदेस वो
सब कुछ दे सकता है जो देस नहीं दे सकता, बस घर नहीं दे सकता|
छोटे होने में बहुत खोट हैं... और सबसे बड़ा खोट
ये कि सारा घर सबसे ज्यादा प्यार आप से ही करता है| पलकों पर रखता है, हाथों में
पालता है|
बरगद की छाया जैसे पिता और बड़े भाई धूप का
काँटा चुभने नहीं देते और अम्मा और भाभी अपने प्रेम के पानी खाद से खिलाये रखती
हैं|
पर बरगद तले खिल रहे फूल कई बार माली जड़ से
निकाल कर खुले आसमान में रोप देता है|
कुछ फूलों का छाँह से निकलना ज़रूरी होता है|
मैं अच्छी जगह हूँ| ज़मीन बहुत सख्त है, धूप कड़कती
तेज़ लेकिन हवा ठंडी है| दिन भर दौड़ा-दौड़ा कर बेदम करने के बाद हौले से थपक भी देती
है|
और दिन न बेदम होना खलता है, न थकना, न भीड़ में
अकेला होना... सच कहूं तो और दिन यही ताकत बनकर दौड़ते हैं नस में- बस ये कुछ दिन
होते हैं जिन पर तन यहीं छोड़कर मन हज़ारों मील की उड़ान भरता है और चला जाता है
अम्मा के द्वारे| जा अटकता है भाई की कलाई पर, भाभी के पल्ले में, बाबा की मुस्कान
में...
कितना कुछ कहना चाहता है न मन फिर, कि दुनिया
के हर उस एक ताने को जो मेरे हिस्से का था, हज़ार-हज़ार उन सवालों को जो बाँध दिए
समाज ने हर लड़की के दामन में—
“इतना पढ़ाकर कौन डॉक्टर बनाना है?; “लड़के नहीं मिलेंगे!”; “ब्याह नहीं होगा!”; “दिमाग
खराब कर दिया है!”; “सिर पर चढ़ा लिया है!”; “पढ़ाई तो ठीक है पर रंग रूप भी देखो ज़रा,
लड़की है आखिर!”;
—को मुझ तक न आने देने के लिए, मेरी चिंता के
साथ, इन दंशों को भी अपने-आप पर झेलने के लिए, सिर्फ शुक्रान अदा कर सकता है ऊपर
वाले का, कि ऐसा परिवार दिया- ऐसा भाई दिया, ऐसे नाते दिए!
देने के लिए फिर और बचता क्या है? क्या दिया जा
सकता है इस प्रेम के बदले, सिवाय प्रेम के?
प्रेम का पूरक सिर्फ प्रेम हो सकता है, जो भेज
रही हूँ मैं, टोकरी भर-भर!
खलिशों, दूरियों को हम दोनों ओर से थोड़ा-थोड़ा
भरेंगे|
विडियो कॉल करेंगे, सुंदर सजेंगे, इंडियन कम्युनिटी
में जायेंगे, सवेरे झंडा लहरायेंगे और दोपहर से लग जायेंगे यूनिवर्सिटी की लाइन
में!
तस्वीर भी लगा देंगे फेसबुक पर|
फासले पाटने को ज़रूरी थोड़े है कि दूरी भी तय की
जाये, बस इस विश्वास का होना काफ़ी है कि प्रेम है, अगाध है और रहेगा| इसी के भरोसे
परदेस में भी अकेले नहीं हूँ, और वहां नहीं होकर भी हूँ| जीने को ये प्रेम काफी है!
ये प्रेम मेरी ताकत है, नेमत है, नूर है— सबकुछ
है!
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