Saturday, 5 November 2016

बिकाऊ बताने को सिर्फ वैश्या नाम ही क्यों?

NDTV पर बैन लगा है। एक चौबीस घंटे का, 9 नवंबर की दोपहर एक बजे से 10 नवंबर की दोपहर एक बजे तक का।

आप सोशल मीडिया का कोई पन्ना, कोई फोरम, कोई पोस्ट और कोई अकाउंट उठा लीजिये, बैन है, बाग़ है और बहार है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, उसकी ही लड़ाई है। लड़ाई सिर्फ एक चैनल की नहीं है, बल्कि उस डर की है जो सबके ज़हन में कुंडली मारे बैठा है। आज NDTV तो कल वो खुद भी हो सकते हैं। यहाँ कोई तटस्थ नहीं, सबका एक पक्ष है। कमसकम, किसी को भी समय को अपने मौन का हिसाब तो नहीं ही चुकाना पड़ेगा।

जैसे रवीश ने कहा, सवाल पर सवाल हैं। पर यहाँ बात सिर्फ सवाल की नहीं, सवाल के तरीके की भी है।
पक्ष वाले रवीश के शुक्रवार के कार्यक्रम से उम्मीद के हिंडोले में झूल रहे हैं और विपक्षी उसे नौटंकी बता कर तमतमा रहे हैं।

यहाँ तक भी सब ठीक था।

पर फिर आये काफ़िये मिलाने के दौर। NDTV को रंडीटीवी बताया गया। पाकिस्तान और कांग्रेस समर्थक बताया गया, माफ़ कीजियेगा 'पोर्किस्तान' समर्थक बताया गया। प्रेस तो जाने कबसे प्रेस्टीट्यूट है ही।

तो सवाल यहाँ ये है कि क्या आपके पास किसी को बिकाऊ बताने के लिए वैश्या से बेहतर कोई उपमा नहीं? या औरत आपको इतनी सस्ती लगती है कि आप जब चाहें, जैसे चाहें उसे गाली बना दें?

क्या ऐसी तुलनायें करते वक़्त आपके ज़हन में एक बार भी ख्याल आता है कि आप समाज के एक पूरे तबके को, जिसकी बेहतरी के लिए कुछ समाज सेवक अपना सारा जीवन होम कर देते हैं, बीसियों साल पीछे धकेल देते हैं? आप उन्हें दुत्कार कर उनसे ये कह देते हैं कि उन जैसों की ज़िन्दगो की कोई वक़त नहीं। 

वैश्या होना, उसकी ज़िन्दगी जीना, उसका तिनका भी समझ पाना आप सोफा-परस्त वाइट-कॉलर, शरीफ लोगों के बस की बात नहीं। जिन गलियों से गुज़रने में आपके जूते अपवित्र हो जाते हैं, और जिन चौखटों पर जाने कितने इज़्ज़तदारों की इज़्ज़त धूल चाट रही होती है, आपमें से किसी में इतना दम नहीं की उस चौखट की सिसक को सुन सके।

बेईमान बिकते हैं, जानेमन। वैश्या तो धंधा करती है क्योंकि उसके पास दूसरा रास्ता नहीं होता। पर आपकी  अंध-भक्ति आपको ये देखने नहीं देगी। रांड कह देने भर से किसी का किरदार नहीं तय होता। इंसान के  किरदार उसकी नियत तय किया करती है।

भारत माता की जय न बोलने पर आप बवंडर उठा सकते हैं, लेकिन अपनी ही भाषा में औरत को गाली बनाते आपको मिनट नहीं लगता। आपके इस दोगलेपन से मितली आती है मुझे।

कभी अपने महंगे जूते लेकर उतरना उन बदनाम गलियों में। सड़ांध, पसीना और घुटन की बू एक साथ दिमाग झन्ना देगी। बीमारी, मजबूरी और लाचारी देखने के लिए किसे के सीने से आँचल खींचना नहीं पड़ेगा। वो तो वहां की हर आँख का काजल है। वहां के चेहरे पिक्चरों जैसे चमकते नहीं, उनपर अमूमन चोट के दाग हुआ करते हैं। वो चोटें जो उनके सालों के शोषण की गवाह हैं। उनके जिस्म इसी लाचारी, बीमारी और गंदगी की भट्टी में रोज़ भुनते हैं।

पर जानते हैं, उनकी आत्मा फिर भी आपसे कहीं उजली है।

क्योंकि वो अपने आप को गाली नहीं मानती। वो फौलाद की तरह जीती हैं, और हिम्मत रखती हैं अपने बच्चों को उस आग से बाहर भेजने के सपने देखने की। रोज़ बिकती हैं, ताकि उनके बच्चे न बिकें। माँ कोई भी हो, अपने बच्चे के लिए एक जैसा ही किलसती है।

जिस देवी के आप उपासक हैं, जिसे आप जगत-जननी कहते हैं, माँ कहते हैं, और जिसकी भक्ति से आप अपना आँगन ही नहीं, पूरा मोहल्ला गुंजायमान रखते हैं, उस देवी की प्रतिमा इस वैश्या के आँगन की मिट्टी के बिना पूजनीय नहीं मानी जाती। उस वैश्या की दान की मिट्टी पर पनपती है आपकी भक्ति! और आप उसे गाली बनाने के अलावा कुछ नहीं दे पाते।

जागिये जानेमन, वरना आप जिस पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में दूसरों को कैरेक्टर सेर्टिफिकेट बांटने में सवेरे को शाम किये जा रहे हैं, वही लड़ाई आपको खुद कितना खोखला कर रही है, ये आप जान भी नहीं पाएंगे।

ये वो वक़्त है जब खुद का किरदार बचाना सबसे मुश्किल है। अपनी चूनर जलाकर ही दूसरे का दामन छींटा जा सकता है। आप अपने आर्ग्युमेंट में दम लाइए। गाली सिर्फ नीचता की निशानी है।
याद रखिये, किसी भी लड़ाई में आप कितना नीचे गिरते हैं ये सिर्फ आपके कैरेक्टर का सेर्टिफिकेट है।

4 comments:

  1. बेहतरीन और भावनात्मक स्तर पर झिंझोड़ने वाला लेख है। ऐसी अभिव्यक्ति की आवाज़ बुलंद करने की जरुरत है।

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  2. बहुत अच्छा, भावनात्मक.

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  3. शुक्रिया मेरे सितारों!

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