Monday, 4 April 2016

मिसिंग यू सुधा आंटी पार्ट 2

कल शांति विधान हो गया। विसर्जन पाठ कराते वक़्त भैया जी ने कहा कि प्रभु से विधान के समय हुए सभी कमियों की,गलतियों की माफ़ी मांग लेते हैं।

मैंने आपसे माफ़ी मांगी थी। बहुत कमियां जो रह गयीं।

आंटी, कल तक बहुत सम्भले हुए थे। पर वो विसर्जन पाठ कहीं इतना गहरा चुभा कि समझा नहीं सकती। हज़ारों बार आपने ही पूजा के आखिर में जिनवाणी में विसर्जन पाठ खोल के दिया था, पढ़ने को। कल भरे मंदिर की दूसरी वाली रो में जहाँ हम दस लक्षण की पूजा के टाइम हमेशा बैठते थे, वो देख कर बिखर गयी।

उधर आखिर बाईं ओर से मम्मी, फिर मैना आंटी फिर आप फिर मैं। ऐसा लगभग फिक्स्ड ही था। आप माइक पे पूजा पढ़ती थीं और धीरे से, मेरे बिना कुछ कहे, मेरी सामग्री का डब्बा उठा कर उसमें चांदी के फूल मिलाकर वापिस रख देती थीं।

कल विधान पढ़ा नहीं गया मुझसे। वहां बैठे सिर्फ मंदिर ही नहीं जाने कितनी और बाते याद आ रहीं थीं। दीवाली वाली मंदिर में आरती, भैया की शादी के कार्ड साथ में तैयार करना, आपका भाई को शादी वाले दिन  कंठा पहनाना, आपका मम्मी को डांटना, पापा से ज़िद्द करना, आपका मुझे भजन सिखाना। भजन वाली याद कांस्टेंट है, पिछली बार भी लिखा था।

कल तेरहवां दिन था। कल आपके जाने के सारे नियम धर्म पूरे हो गए। "आत्मा की शांति" थोडा भारी शब्द है और दिल पर किसी पत्थर जैसा। मैं इस्तेमाल नहीं करुँगी।

कल एहसास हुआ कि कह देना कितना ज़रूरी होता है। वो थोड़ी-बहुत उलटी-सीधी 6-7 लाइन की कविताओं के बाहर आपको कभी बताया ही नहीं कि आप कितनी ज़रूरी हैं। कि आप से कितना प्यार है। कि आप सचमुच माँ जैसे ही हैं।

कमी थोड़ी हम ही में है। बोल नहीं पाते। जताना नहीं आता, कमबख्त लिखवा लो। और आलसी इतने कि कभी-कभी ही लिखते हैं।
कल लगा काश आपको कह दिया होता। कभी एक बार ही सही, पर बता दिया होता कि आप हमारे लिए क्या है। वो साथ में तैयार होकर, प्रेम स्टूडियो जाकर एक फ्रेम करने लायक फ़ोटो खिंचवाने की इच्छा अधूरी ही रह गयी। 

कल दिल्ली जाने की ट्रेन नहीं मिली। चोट लग गयी है तो जाने का मन भी नहीं था। कल फिर किसी ने कहा कि आपने उनसे हमारी बहुत तारीफ करी है। क्यों की आपने इतने लोगों से मेरी इतनी तरीफ़? क्या मिल गया?

हम नहीं हैं इतने अच्छे।

होते तो शायद अंकल और पूजा भाभी का थोड़ा सा दुःख कम कर पाते। कुछ भी नहीं कर पा रहे पर हम। पर कहना क्या होता है, वो पता ही नहीं हमें।

आप भी तो सबको ऐसे छोड़ कर चल दीं।

पर आपसे न, अब एक वादा है। कह नहीं भी पाये तो अब लिखेंगे ज़्यादा। जताना सीख लेंगे, सीखने की कोशिश तो करेंगे ही।

आपके नाम पे आंसू  आते ही रहेंगे। उसमें कोई कुछ नहीं कर सकता। पर वो सारी मुस्कुराहटें, सारी यादें भी उतनी ही शिद्दत से जोड़ के रखेंगे। टाइम टू टाइम उनको संदूक से निकाल कर धो-पोंछ कर सबके साथ बाँट भी लेंगे।

आज दिल्ली वापिस जाना है। और यही सबसे मुश्किल लग रहा है। यहाँ आपके पास महसूस होता है। वहां न, ढेर काम है, यादों के लिए वक्त कम रहेगा, तकलीफ भी शायद महसूस कम हो।

पर वहां भी रात तो होगी। जब सोना होता है, जब काम नहीं होता, जब दिमाग और दिल एक साथ सोचते हैं, जब यादें बस की नहीं रहती...

तब तारों में खोजेंगे आपको। अब तो आप आसमान में है, तारा बन गयीं हैं, और तारे दिल्ली या कानपुर का फर्क तो करते नहीं।

तो रात को बालकनी से आसमान में खोजेंगे आपको। और देखिये, जल्दी मिल जाइयेगा, रात तक थक बहुत जाते हैं न...

मिस यू आंटी, विल कीप मिसिंग यू, ऑल्वेज़!
लव यू एंड आई नो, यू लव मी मोर।

कम बेक सून....
आपकी,
मैं।

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